पांचना बांध से नहीं मिला पानी, केवलादेव में जलीय जीवों पर संकट गहराया
भरतपुर: विश्व प्रसिद्ध केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (घना) इस समय पानी की भारी किल्लत का सामना कर रहा है। पांचना बांध से समय पर पानी नहीं छोड़े जाने के कारण उद्यान के प्राकृतिक जल स्रोत तेजी से सूखने लगे हैं। इस स्थिति के चलते यहां पाई जाने वाली 375 से अधिक पक्षी प्रजातियों, वन्यजीवों और स्थानीय पर्यटन उद्योग पर गंभीर खतरा मंडराने लगा है। स्थानीय गाइडों, रिक्शा चालकों और निवासियों ने सरकार से पार्क के लिए स्थायी जल प्रबंधन और तुरंत पानी की आपूर्ति करने की मांग की है।
जल स्रोत सूखने से मछलियां मरीं, चंबल से मिल रहा अपर्याप्त पानी
मानसून के मौसम के बावजूद उद्यान को आवश्यक पानी नहीं मिल सका है, जिससे तालाबों और झीलों का जलस्तर गिरता जा रहा है। जल संकट के चलते पार्क में छोटी मछलियां मरने लगी हैं, जिन्हें बचाने के लिए दूसरे ब्लॉकों में स्थानांतरित किया गया है। फिलहाल वैकल्पिक व्यवस्था के तहत चंबल नदी से पानी दिया जा रहा है, लेकिन यह आपूर्ति जरूरत की तुलना में बहुत कम साबित हो रही है। पांचना बांध का पानी पक्षियों के प्राकृतिक भोजन और जलीय वनस्पति के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है, जिसकी कमी से पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो रहा है।
पर्यटन और स्थानीय आजीविका पर पड़ा सीधा असर
जल संकट का असर केवल बेजुबान पक्षियों और वन्यजीवों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था भी बुरी तरह प्रभावित हो रही है। उद्यान पर निर्भर रहने वाले नेचर गाइड, रिक्शा चालक और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों की आजीविका पर संकट खड़ा हो गया है। पार्क में पानी की कमी और पक्षियों की घटती संख्या के कारण पर्यटकों की आवक में गिरावट आई है, जिससे स्थानीय रोजगार को बड़ा झटका लगा है।
प्रशासन ने उच्च अधिकारियों से मांगी 550 एमसीएफटी पानी की आपूर्ति
उद्यान प्रशासन के अनुसार केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान को सुचारू रूप से चलाने के लिए हर साल जुलाई तक लगभग 550 एमसीएफटी पानी की आवश्यकता होती है। इस वर्ष निर्धारित समय पर पानी न पहुंचने के कारण संकट बढ़ा है। पार्क प्रबंधन ने मामले की गंभीरता को देखते हुए उच्च अधिकारियों को स्थिति से अवगत करा दिया है और जल्द से जल्द पर्याप्त मात्रा में पानी जारी करने का अनुरोध किया है ताकि उद्यान की जैव विविधता को सुरक्षित रखा जा सके।

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