नाथद्वारा: पुष्टिमार्ग के सुप्रसिद्ध प्रधानपीठ श्रीनाथजी मंदिर में निर्जला एकादशी के पवित्र मौके पर देश के कोने-कोने से आए श्रद्धालुओं का भारी हुजूम उमड़ पड़ा। सुबह तड़के मंगला झांकी के दीदार से शुरू हुआ भक्तों का सिलसिला राजभोग और संध्या दर्शन तक लगातार जारी रहा। मंदिर परिसर जय श्रीनाथजी और हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की के जयकारों से गुंजायमान रहा। इस पावन अवसर पर हजारों भक्तों ने गिरिराज पर्वत और मंदिर की परिक्रमा कर पूजा-अर्चना की और प्रभु से सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मांगा।

श्वेत मलमल और मोतियों संग कलियों का मनमोहक श्रृंगार

निर्जला एकादशी के खास पर्व पर प्रभु श्रीनाथजी का बेहद विशेष और मनभावन ग्रीष्मकालीन श्रृंगार किया गया। ठाकुरजी को शीतल श्वेत (सफेद) मलमल का सुंदर पिछोड़ा अंगीकार कराया गया। इसके साथ ही प्रभु के चरणारविंद तक हल्के मोतियों के आभूषण, शीश पर मोतियों का मुकुट (किरीट), पान, कुंडल और पुष्पों की मालाएं सजाई गईं। सबसे विशेष आकर्षण संध्या आरती के समय देखने को मिला, जब प्रभु को सुगंधित और कलात्मक कलियों का अद्भुत श्रृंगार धराया गया, जिसे देखकर वहां मौजूद सभी श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे।

जल के घट, हाथ के पंखे और वस्त्रों का महादान

इस पावन एकादशी पर दान-पुण्य का विशेष महत्व होने के कारण मंदिर मार्ग में भक्तों ने जमकर सेवा कार्य किए। श्रद्धालुओं ने भीषण गर्मी को देखते हुए शीतल जल से भरे मिट्टी के घट (मटके), हाथ के पंखे, मौसमी फल, वस्त्र और नकद दक्षिणा का श्रद्धापूर्वक दान किया। मंदिर के आसपास और परिक्रमा पथ पर बैठे जरूरतमंदों व याचकों को भी भक्तों ने खुले दिल से भोजन और दान-सामग्री वितरित की।

परिक्रमा के साथ जीव दया और गौ सेवा का संकल्प

भक्ति के इस माहौल में भोर होते ही श्रद्धालुओं द्वारा गिरिराजजी की परिक्रमा शुरू कर दी गई थी। विशेषकर महिला श्रद्धालुओं ने निर्जला व्रत रखते हुए जीव-दया का अनुपम उदाहरण पेश किया। महिलाओं और परिवारों ने परिक्रमा के दौरान जगह-जगह पक्षियों के लिए परिंडे बांधे, दाना डाला और गौशालाओं में जाकर गायों को हरा चारा व लापसी खिलाकर एकादशी का महापुण्य कमाया।