TMC के बाद BJP का फोकस RLM पर, 4 में से 3 विधायक संपर्क में बताए जा रहे
कोलकाता/पटना: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त झेलने के बाद ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) इस समय गहरे राजनीतिक संकट से गुजर रही है। राज्य विधानसभा में पार्टी के भीतर मचे घमासान के बाद अब संसद में भी टीएमसी के टूटने के आसार नजर आ रहे हैं। खबरों के मुताबिक, टीएमसी के करीब 20 लोकसभा सांसदों ने एक गुप्त पत्र लिखकर केंद्र की मोदी सरकार को अपना समर्थन देने की बात कही है, जिसके बाद बंगाल से लेकर दिल्ली तक सियासी हलचल तेज हो गई है। पश्चिम बंगाल के इस बड़े घटनाक्रम के बीच अब भारतीय जनता पार्टी (BJP) की नजर बिहार में अपनी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की सहयोगी पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) पर टिक गई है।
आरएलएम के बीजेपी में विलय को लेकर बढ़ा तनाव
सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, राष्ट्रीय लोक मोर्चा के तीन प्रमुख विधायक आलोक कुमार सिंह, रामेश्वर महतो और माधव आनंद लगातार बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व के संपर्क में बने हुए हैं। दावा किया जा रहा है कि इसी साल जब उपेंद्र कुशवाहा को एनडीए की मदद से राज्यसभा भेजा गया था, तब उनसे उनकी पार्टी (RLM) का बीजेपी में विलय कराने का एक अनौपचारिक आश्वासन लिया गया था। इसके बाद जब कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश को बिहार सरकार में दोबारा मंत्री बनाने की बात आई, तब भी बीजेपी की ओर से इस विलय के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया गया था। हालांकि, उपेंद्र कुशवाहा ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए साफ कर दिया है कि वे केवल किसी राजनीतिक पद या सौदेबाजी के लिए अपनी पार्टी का अस्तित्व खत्म नहीं करेंगे और न ही बीजेपी में विलय करेंगे।
एनडीए में घटता प्रभाव और बिहार चुनाव के समीकरण
एक समय था जब उपेंद्र कुशवाहा को बिहार एनडीए का एक बेहद कद्दावर और असरदार चेहरा माना जाता था, लेकिन पिछले कुछ समय से गठबंधन के भीतर उनका सियासी प्रभाव लगातार कम होता दिख रहा है। विशेष रूप से जब से सम्राट चौधरी ने बिहार के मुख्यमंत्री पद की कमान संभाली है, तब से कुशवाहा समाज की राजनीति में उपेंद्र कुशवाहा की भूमिका काफी हद तक सीमित हो गई है। हालांकि, साल 2025 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी ने विपरीत परिस्थितियों में भी 6 में से 4 सीटों पर शानदार जीत दर्ज कर अपनी मजबूत मौजूदगी का अहसास कराया था। मगर वर्तमान में बिहार विधानसभा में एनडीए के पास भारी और स्पष्ट बहुमत होने के कारण, सीट शेयरिंग या अन्य मामलों में उपेंद्र कुशवाहा की सौदेबाजी करने की ताकत काफी कमजोर पड़ गई है।
उपेंद्र कुशवाहा को लगा बड़ा झटका, बेटे का मंत्री पद खतरे में
बिहार विधान परिषद (MLC) चुनाव के लिए जारी हुई उम्मीदवारों की सूची में बीजेपी ने अपने सहयोगी उपेंद्र कुशवाहा को एक बड़ा सियासी झटका दिया है। आगामी 18 जून को होने वाले विधान परिषद चुनाव के लिए एनडीए ने बिहार सरकार के पंचायती राज मंत्री और उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश को अपना प्रत्याशी नहीं बनाया है। चूंकि दीपक प्रकाश ने पिछला विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा था और उन्हें सम्राट चौधरी कैबिनेट में सीधे मंत्री पद की शपथ दिलाई गई थी, इसलिए मंत्री बने रहने के लिए छह महीने के भीतर उनका किसी भी सदन का सदस्य बनना अनिवार्य था। अब एनडीए से टिकट न मिलने के कारण उनका मंत्री पद जाना लगभग तय माना जा रहा है।
दीपक प्रकाश की प्रतिक्रिया और पार्टी के भीतर परिवारवाद का विरोध
एनडीए द्वारा एमएलसी का टिकट न दिए जाने के बाद कैबिनेट मंत्री दीपक प्रकाश की ओर से भी पहली आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आई है। उन्होंने बेहद नपे-तुले शब्दों में कहा कि उन्हें एनडीए के शीर्ष नेतृत्व के आशीर्वाद से ही मंत्री पद की जिम्मेदारी मिली थी, और जब तक गठबंधन के बड़े नेताओं का भरोसा उन पर बना रहेगा, वे इस पद पर काम करते रहेंगे। हालांकि, उन्होंने टिकट कटने के फैसले पर किसी भी तरह की सीधी टिप्पणी करने से साफ इनकार कर दिया।
गौरतलब है कि दीपक प्रकाश को बिना चुनाव लड़े सीधे मंत्री बनाए जाने के फैसले के बाद खुद राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के भीतर ही बगावत के सुर तेज हो गए थे। पार्टी के चार में से तीन विधायकों ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए आरोप लगाया था कि उपेंद्र कुशवाहा पार्टी में केवल 'परिवारवाद' को बढ़ावा दे रहे हैं। विधायकों का तर्क था कि खुद कुशवाहा राज्यसभा सांसद हैं, उनकी पत्नी स्नेहलता कुशवाहा विधानसभा की सदस्य हैं और अब उन्होंने बिना किसी सदन की सदस्यता के अपने बेटे को भी सीधे कैबिनेट मंत्री बनवा दिया। इस फैसले के विरोध में पार्टी के सात वरिष्ठ पदाधिकारियों ने अपने पदों से इस्तीफा भी दे दिया था, जिसने अब पार्टी को टूटने की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है।

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