देश के अन्नदाता पर भारी संकट: आत्महत्या मामलों में 56% कृषि मजदूर शामिल
नई दिल्ली | देश में अन्नदाताओं की स्थिति अब भी चिंताजनक बनी हुई है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के साल 2024 के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, कृषि क्षेत्र से जुड़े 10,546 लोगों ने आत्महत्या की है। हालांकि, 2023 के 10,786 मामलों के मुकाबले इस संख्या में मामूली गिरावट देखी गई है, लेकिन भयावह तथ्य यह है कि आज भी भारत में औसतन हर दिन 28 किसान और खेतिहर मजदूर मौत को गले लगा रहे हैं। यानी हर 60 मिनट में एक व्यक्ति कृषि संकट के कारण अपनी जान गंवा रहा है।
खेतिहर मजदूरों पर बढ़ता आर्थिक बोझ
रिपोर्ट के सबसे चिंताजनक पहलुओं में से एक यह है कि अब किसानों से ज्यादा खेतिहर मजदूर आत्महत्या कर रहे हैं। कुल 10,546 मामलों में से 5,913 (लगभग 56%) कृषि मजदूर थे। साल 2020 में यह हिस्सेदारी 47.75% थी, जो अब बढ़कर आधे से अधिक हो गई है। जानकारों का मानना है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में खेती से होने वाली आय घटने और मजदूरी पर बढ़ती निर्भरता ने आर्थिक असुरक्षा को और अधिक गहरा कर दिया है, जिससे मजदूरों में हताशा बढ़ रही है।
महाराष्ट्र में सर्वाधिक मौतें, कर्नाटक में उछाल
भौगोलिक दृष्टि से देखें तो महाराष्ट्र अभी भी इस संकट का केंद्र बना हुआ है। साल 2024 में महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 3,824 मामले दर्ज किए गए, जो पूरे देश की कुल कृषि आत्महत्याओं का लगभग 36% हिस्सा है। इसके बाद कर्नाटक (2,971) और मध्य प्रदेश (835) का नंबर आता है। चौंकाने वाली बात यह है कि कर्नाटक में आत्महत्या की दर में पिछले साल के मुकाबले 22.61% की भारी वृद्धि देखी गई है। वहीं, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में यह आंकड़ा तुलनात्मक रूप से काफी कम रहा।
क्षेत्रीय उतार-चढ़ाव और पुदुचेरी के बदलते हालात
आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि जहां आंध्र प्रदेश में आत्महत्या के मामलों में 15.67% की राहत भरी कमी आई है, वहीं राजस्थान में 14% और मध्य प्रदेश में 7.46% का इजाफा हुआ है। केंद्र शासित प्रदेश पुदुचेरी से भी हैरान करने वाले आंकड़े सामने आए हैं; जहां 2019 से 2022 के बीच एक भी मामला दर्ज नहीं था, वहां 2023 में 10 और अब 2024 में यह संख्या बढ़कर 33 हो गई है। हालांकि 2022 के 11,290 मामलों के शिखर के बाद से कुल संख्या घट रही है, लेकिन जमीनी हकीकत अब भी गंभीर सुधार की मांग करती है।

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